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सांप्रत कालीन स्वाध्याय शृंखला

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Guruji
विषय :
वेदांताचार्य श्री धर्मराजाध्वरेंद्रजी विरचित


        "वेदान्त परिभाषा"
(व्याख्याकार डॉ. गजानन शास्त्री मुसलगांवकरजी
  के हिंदी व्याख्यापर आधारित स्वाध्याय)

[१ से ३० सितंबर २०१०
]


गुरूजी :
प. पू. स्वामी श्री हरिहरानंदजी सागर महाराज

  

विषय के संदर्भ में :  

भगवान श्री धर्मराज अध्वरीन्द्र द्वारा प्रणीत वेन्दात परिभाषा एक प्रकरण ग्रन्थ है । वेदान्त दर्शन में तीन प्रकार के ग्रन्थ उपल्ब्ध होते है । जैसे प्रमाण ग्रन्थ, प्रमेयग्रन्थ तथा प्रकरण ग्रन्थ । वेदान्त परिभाषा को प्रकरण ग्रन्थ रूप में विद्वानों ने माना है । इसमें आठ प्रकरण है । प्रत्यक्षादि छः प्रमाणॉं को छ परिच्छेदों के रूप में माना है सप्रेम परिच्छेद में जीव व्रह्म की एकता का प्रतिपादन किया गया है । अष्टम परिच्छे में मोक्ष का निरुपण किया है ।
वेदान्त दर्शन में विशेष रूप से भामती प्रस्थान और विवरण कारका प्रस्थान प्रसिद्ध है । यद्यपि कुत्रचित् कदाचित् दोंनो के मतभेद देखने में आते है । परन्तु लक्ष्य में कोई भेद नही है । दोनो का लक्ष्य जीव-व्रहम की ऍक्य प्रतिपादन में तात्पर्य है । जीव ब्रह्मैवनापरः।
वेदान्त परिभाषा कार धर्मराजाध्वरीन्द्र  के मत मे बिना लक्षणा से महावाक्य का अर्थबोध हो सकता है तो क्या आवश्यकता है। यह उनकी विशेष अर्थानुसन्धान है।
शांकर वेदान्तरूपी समुद्र में प्रवेश करने के लिए गंगादि रूपी वेदान्त परिभाषा नदियों का आश्रय लेना ही श्रेयस्कर है।
धर्मराजाध्वरीन्र्द को शतशत प्रणाम् ॥

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