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क्षेत्र क्षेत्रज्ञ योग - (गीता अध्याय-१३) - [२१ से ३१ दिसंबर २००८] - प्रवचन पुरालेख


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 विषय : Pravachankaar

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ योग - (गीता अध्याय-१३)

[२१ से ३१ दिसंबर २००८]

प्रवचनकार :

प. पू. कैलासपीठाधीश्वर म.मं.स्वामी श्री दिव्यानंद सरस्वतीजी महाराज

विषय के संदर्भ में :

गीता के त्रयॉदशाध्याय में मॉक्षसाधन ब्रह्मज्ञान,ब्रह्मज्ञान का साधन अमानित्वादि तथा ब्रह्म का स्वरूप स्पष्ट रूप से कहा गया है.
त्रिगुणात्मिका प्रकृति,देह इन्द्रिय विषयाकार से परिणत हॉकर जीव कॉ अपवर्ग देती है.उस दृष्यवर्ग़ अर्थात भूतभौतिक प्रपंच कॉ क्षेत्र ऍसे कहा जाता है.क्षेत्र कॉ जाननेवाले को क्षेत्रज्ञ कहा जाता है जो की ईश्वर का ही स्वरूप है.आकाश के समान एक ही चैतन्य सब के अंर्तबाह्य परिपूर्ण असंग रहता है,देह रूप उपाधि के भेद से अनेक जैसे प्रतीत होता है.उस दृक रूप चैतन्य दृश्य से भिन्न जीव का वास्तव स्वरूप है.उस का यथार्थ ज्ञान ही संसार कारण अज्ञान का निवर्तक है.
इस प्रवचन शृंखला में क्षेत्र क्षेत्रज्ञ का निरूपण किया जाएगा.

 'क्षेत्र क्षेत्रज्ञ योग' पर अगले साल ९ दिसंबर २००९ से सुनिए>> 

 

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